भाव-विस्तार

Madhyamik Pariksha को ध्यान में रखते हुए, कुछ भाव-विस्तार नीचे दिए गए हैं।

BHAV VISTAR
भाव-विस्तार

1. अधिकार खोकर बैठ जाना यह महा दुष्कर्म है ।

यह पंक्ति मनुष्य को पुरुष की प्रेरणा देती है। शांति के लिए त्याग उचित होता है । पर, अधिकार खोकर शांति प्राप्त करने में अन्याय को बढ़ावा मिलता है, अत्याचारी को गलत प्रोत्साहन मिलता है। अतः अपना अधिकार खोकर निराश बैठ जाना भी दुष्कर्म ही बताया गया है । मनुष्य को चाहिए कि अधिकारियों वाले से विरोध करें , अपने अधिकार की मांग करें, यदि शांति पूर्वक दे देता है तो ठीक है पर नहीं देता है तो संघर्ष अनिवार्य हो जाता है। अधिकारों के साथ मनुष्य को कर्तव्य पालन करना पड़ता है जिससे दूसरे के अधिकारों की रक्षा होती है। कर्मठ व्यक्ति अपने अधिकारों की रक्षा के लिए प्राणों की बाजी लगा देते हैं । अधिकार खोकर शांति एवं धैर्य की बातें करने वाले संसार में कायर कहलाते हैं। अन्याय पूर्वक दूसरों का अधिकार छीनने वालों से संघर्ष अनिवार्य हो जाता है और यही मानव धर्म है। गीता में हमें अन्यायियों से युद्ध करने की प्रेरणा देती है। भारत में स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए अंग्रेज शासकों के विरोध आंदोलन छेड़ा था। इसकी रक्षा करनी चाहिए अधिकारों के प्रति सजग ना रहने पर स्वेच्छाचारीता, निरंकुशता और अन्याय की प्रवृत्ति सशक्त होती है । त्याग तप और शांति के नाम पर अधिकार खोकर जीवित रहना मृत्यु वरन करने के समान होता है । सही में, दिनकर जी ने कहा है- ” चिंता है स्वप्न कोई और तू त्याग तप से काम ले यह पाप है ।

2. मनुष्य वही है जो मनुष्य के लिए मरे ।

परोपकार ही जीवन का प्रेम और से हैं या एक सर्वोत्तम तथा निरापद धर्म भी है । जीवन के आधारभूत कल्याणकारी तत्व का धारक धर्म ही है जिस पर जीवन टिका है । परोपकार ही सर्व कल्याणकारी और सर्व मांगलिक होता है । जब हम परिवार समाज राष्ट्र और विश्व के कल्याण की वेदी पर अपने सुख स्वार्थों की बलि चढ़ा कर दूसरों के कल्याण नार्थ कार्य करते हैं तो वह परहित का कार्य होता है । परहित का तात्पर्य- सर्व हिताय कार्य से हैं । इसके अनुष्ठान से हम अपने एक्सप्रेस आत्मिक गुणों का परिचय देते हैं । मनुष्य होने के नाते हम सामाजिक प्राणी है । अतः हमारा कर्तव्य है कि परोपकार पूर्ण कर्म के द्वारा समाज के ऋण से उऋण हो । जब प्रकृति का हर उत्पादन वृक्ष नदी पहाड़ सूर्य चंद्र तारे आदि दिन-रात परोपकार करने में संलग्न रहकर अपना कार्य कर अपनी सार्थक स्थिति का भान कराते हैं तो हमारा दायित्व क्या होना चाहिए । दूसरों के लिए कष्ट जाना या मरना ही जीवन को सार्थकता प्रदान करता है जो सुख त्याग व परमार्थ में रहते हैं । वह संग्रह और स्वार्थ में नहीं रहते हैं और अब कार मानवता के वर्ण का सचमुच एक असाधारण साधन है । कहा जाता है कि मनुष्य परोपकार करते हुए अपने जीवन का यापन करना चाहिए ।

3. निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल।

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कवि कहना चाहते हैं कि अपनी मातृभाषा की उन्नति तथा प्रगति में हमारे चतुर्दिक विकास का मूल मंत्र छिपा हुआ है । अतः अपनी मातृभाषा के साथ हमारा अत्यधिक गहरा लगाव होना चाहिए । यही भाषा हमारी संस्कृति परंपरा राष्ट्रीय इतिहास और अपने परिवेश की उपज मानी जाती है । अपनी ही भाषा में हमारी संस्कृति बोलती है । परंपरा सांस लेती है और जातीय गौरव हंसता रहता है । यही हमारी भाषा हमारे मन और मस्तिष्क हृदय और चेतना को अनुकूल तथा स्वाभाविक खुराक देकर हमें सही उन्नति का मार्ग दर्शन कराती है । हमारे ऊपर ऐतिहासिक सांस्कृतिक धार्मिक पारिवारिक और सामाजिक संस्कार का सही छाप छोड़ देती है । इसी से हमारी अभिव्यक्ति स्वभाविक स्वरूप आती है । इसी से हमारे मन और प्राण को स्वाभाविक खुराक मिलता है। ठीक इसके विपरीत विदेशी भाषा व संस्कृति का अनुकूल प्रभाव हमारे मन पर कभी पढ़ नहीं सकता क्योंकि उसमें दूसरे देश का इतिहास और परंपरा होती हैं । इसीलिए हमें यह सोचना चाहिए कि अपनी मातृ भाषा की उन्नति का मार्ग हमेशा प्रशस्त करते हुए आगे बढ़ना चाहिए क्योंकि इसकी उन्नति से ही हमारी उन्नति संभव है ।

4. परिश्रम ही सफलता की कुंजी है ।

प्रयत्न और परिश्रम की बड़ी महिमा होती है । परिश्रम और पद प्रयत्न द्वारा ऑल लव भैया को भी लव्य बनाया जा सकता है । जीवन में सफलता के लिए कठोर परिश्रम आवश्यक होता है । आलस्य मानव का सबसे बड़ा दुश्मन है और परिश्रम आलस्य का कहा भी गया है कि करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान । इसका तात्पर्य यह है कि परिश्रम द्वारा भाग्य रेखा को भी बदला जा सकता है । विद्यार्थी जो परिश्रमी होते हैं, सफलता उनका सदैव वर्णन करती हैं । इसी प्रकार समाज देश मानवता के विकास में श्रमजीवीओं की महत्ता अतुलनीय होती है। पक्षी परिश्रम द्वारा अपने लिए घोंसला बनाकर अन्य पक्षियों की तुलना में सुरक्षित और सुखद जीवन जी लेती हैं । अपना खून पसीना एक कर किसान और मजदूर हमारे लिए आवश्यकता की चीजों का उत्पादन करते हैं। परिश्रमी व्यक्ति भाग्य पर नहीं अपने श्रम पर विश्वास करता है । किसी भी व्यक्ति को सफलता प्राप्त करने के लिए परिश्रम तो करना ही पड़ेगा। परिश्रम के बगैर कोई काम किया ही नहीं जा सकता और परिश्रम ही है जो किसी को उन्नति के पथ पर ले जाने में सहायक होता है । दूसरे शब्दों में कहा जाए तो परिश्रम के बगैर कोई व्यक्ति कुछ प्राप्त कर ही नहीं सकता निश्चय ही परिश्रम सफलता की कुंजी है ।

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5. नर हो, न निराश करो मन को ।

संघर्ष ही जीवन है । मनुष्य को अपने जीवन में प्रतिपल संघर्षों का सामना करना पड़ता है । वह कभी अपने संघर्ष में विजय प्राप्त कर लेता है तो कभी उसके सामने घुटने टेक देता है । पराजय की स्थिति में वह निराश होने लगता है। ऐसी स्थिति हमारे जीवन में बड़ी घातक सिद्ध हो सकती है । हमें जानकर जीवन संग्राम में अग्रसर होते रहना चाहिए या जान लेना चाहिए कि सुख और दुःख गाड़ी के पहिया की तरह होती है , एक के बाद दूसरा का आना लगा रहता है । फल स्वरुप जीवन में हर्ष और विषाद दोनों का मिलन हो ना जारी रहता है । सफल और फल दोनों ही स्थिति में हमें संभव बनाए रखना चाहिए और प्रयास करते रहना चाहिए । प्रयत्न परिश्रम का प्रयोग कर निरंतर जीवन पथ पर अग्रसर होते रहना चाहिए । ऐसा नहीं कि दुःख को देखकर निराश हो जाए और उसको सुधारने का सोचे ही मत जीवन में हमेशा आगे बढ़ते रहना चाहिए । अपने जीवन में नीरसता को जगह नहीं देना चाहिए ।

6. अधजल गगरी छलकत जाए ।

आधी भरी गगरी छलक दी जाती है परंतु पूर्ण भरी गगरी नहीं झलकती है। उपर्युक्त कथन का तात्पर्य यह है कि अब पूर्ण या कम ज्ञान बड़ा ही स्थिर होता है लेकिन वही विद्वान व्यक्ति में कभी स्थिरता नहीं होती है । समुद्र में कभी बाढ़ नहीं आती है परंतु छोटी छोटी नदियां तनिक व्यवस्था में उफनने में लगती है । अल्प ज्ञान वाले व्यक्ति बना बनाया काम भी नाकामयाब कर देता है । परंतु धैर्यवान व्यक्ति गंभीर और विद्वान व्यक्ति सहज ही सफल हो जाते हैं । इसलिए कहा जाता है कि कम ज्ञान सदा खतरनाक होता है । जीवन की पूर्णता अधूरा ज्ञान और जल में नहीं बल्कि पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने में ही है । दिखावा या अपने आप को प्रदर्शित करने से व्यक्ति हल्का हो जाता है, थोड़ा सा ज्ञान लेकर आप बहुत जानते हैं । उस तरह का दिखावा करना बहुत ही खतरनाक होता है । अगर आपके पास ज्ञान हैं, किसी भी विषय पर थोड़ा सा ज्ञान है । उसको दिखाइए मत कि आप बहुत जानते हैं तो यही चीज बताया गया है कि जो थोड़ा जानता है, थोड़ा ज्ञानी है, वह दिखाता है कि बहुत जानता है । जीवन में कहा जाता है कि गंभीर बनना है, धैर्यवान बनना है और किसी भी चीज पर पूरी ज्ञान को प्राप्त लीजिए । इसलिए कहा गया है – “अधजल गगरी छलकत जाए भरी गगरिया चुपके जाए ।”

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7. हम बढ़े उधर कि जिधर राष्ट्र की पुकार हो ।

राष्ट्र है तो हम भी हैं। राष्ट्रहित भी अपना हित है। हमारा प्रत्येक कार्य राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर ही होना चाहिए। हमारे एक-एक प्रयास राष्ट्र के लिए ही होना चाहिए । राष्ट्र का उत्थान और उन्नति हमारे लिए उत्थान और उन्नति को लेकर आएगा। अगर आप अपने राष्ट्र के प्रति इमानदार और कर्म योगी ना होंगे तो राष्ट्र के लिए आप कुछ नहीं कर पाएंगे। इसीलिए कहा गया है – “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।” इसका तात्पर्य है कि माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है। मनुष्य जिस धरती पर जन्म लेता है और जिस देश के वातावरण में पलता है, उसके प्रति भी उसका महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है । जिस प्रकार मनुष्य अपने आप का विधाता है, ठीक उसी प्रकार उसके क्रियाकलापों से राष्ट्र की उन्नति और अवनति निर्भर करती है । अतः हमें याद रखना चाहिए कि राष्ट्र के उत्थान और विकास के लिए अपने कर्म कार्य से आगे बढ़ते रहना चाहिए ।

8. चलना है, कि वह चलना है, जीवन चलता ही रहता है।

परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है । संसार में जीवन गतिशील रहती है । गतिहीनता ही मृत्यु का देवता के पानी के बुलबुले की तरह फट जाने वाले क्षणभंगुर जीवन में गतिशीलता का होना नितांत आवश्यक है । यही कारण है कि हमारे मनीषियों ने “चरैवेति चरैवेति” अर्थात निरंतर चलते रहने के सिद्धांत को मान्यता प्रदान किया है । देख लीजिए जो जल स्थिर होता है, वह स्वच्छ नहीं होता है जो जल वातावरण है वह शुद्ध होता है । इसी चीज को लेकर कहा जाता है कि चलने का अर्थ है गतिशील और क्रियाशील होना और स्वच्छ होना । अज्ञेय जी ने कहा है-” जो रमन नहीं करता है, वह राम नहीं टिक ना तो मौत है । ” अतः हम देखते हैं कि जीवन में चलते रहना, आगे की ओर बढ़ते रहना ही जीवन का नाम है, रुकना बिल्कुल गलत है ।

9. दे मन का उपहार सभी को, ले चल मन का भार अकेले।

यह संसार कष्टों से भरा है। प्रत्येक व्यक्ति संपन्न हो या विपन्न, विद्वान हो या मूर्ख- सबकी अपनी समस्याएं हैं। अपने-अपने कष्ट हैं, अपनी अपनी चिंताएं हैं। आज बढ़ते प्रतिस्पर्धा के होड़ में पुत्र में लोगों की आकांक्षाएं पूरी नहीं हो पाती हैं और वह इन परिस्थितियों में चिंतित जीवन बिताता है। उपर्युक्त अंश में कवि यह संदेश देते हैं कि हमें अपने कष्टों से चिंतित नहीं होना चाहिए और अपने व्यवहार व आचरण से उसे दूसरे पर प्रकट नहीं करना चाहिए। हमें अपनी चिंताओं और कष्टों को अपने भीतर समेट कर उनका समाधान सोचना चाहिए। हमें सब के साथ मिलकर चलना चाहिए तथा सब के कष्टों, दु:खों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए।

10. यदि फूल नहीं बोल सकते हो, कांटे कम से कम मत बोलना।

उपर्युक्त उक्ति में दो मुहावरे संयुक्त हैं – फूल बोना तथा कांटा बोना। फूल और कांटा क्रमशः सुख और दु:ख के प्रतीक हैं। अतः इस आधार पर कवि की उक्ति मनुष्य को उपदेश दे रही है कि तुम्हारा कर्तव्य फुल बोते रहना है अर्थात यथासंभव उपकार या भलाई में जीवन व्यतीत करते रहना है। यही सबसे बड़ा मानव धर्म है। ‘परहित सरिस धर्म नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई “- की मुक्ति भी इसी धर्मिता की चेतना पर रही है। अतः दूसरे को सुख देना उसकी भलाई करना मानव धर्म है। परंतु कुछ ऐसे भी व्यक्ति होते हैं जो न किसी का उपकार करते हैं और न तटस्थ ही रह पाते हैं बल्कि दूसरों के मार्ग में कांटा बोते चलते हैं। ऐसे लोगों को संकेत करके कहा गया है कि यह मानवता के प्रति अधर्म का काम है । हमें किसी भी प्रकार की बुराई नहीं करनी चाहिए। भला करना कर्तव्य है पर बुरा करने का अधिकार नहीं है।

11 . अपने सुख को विस्तृत कर लो जग को सुखी बनाओ

मानव जीवन की कई धर्म भूमिया है- व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र एवं लोक (विश्व)।ये क्रमशः  धर्म-विस्तार के सोपान हैं। यह बात भी सिद्ध है कि यदि हम अपने को सुखी बनाना चाहते हैं तो उससे पहले अपने आसपास को सुखी बनाना पड़ेगा। हम अकेले सुखी नहीं रह सकते है।अतः हमें निज की लघु सीमा का क्रमशः विस्तार चाहिए। हमें बड़े या विश्वधर्म को अपनाकर ही सुखी बन सकते हैं। संसार को सुखी बना कर ही हम भी अपने सुख का विस्तार कर सकते हैं । अकेला हमारा सुख तो पास पड़ोस के दु:खों से घिरा रहेगा। उसकी सीमा बहुत संकीर्ण होगी तथा हमारे सुख पर भी सदा खतरा बना रहेगा। इस कारण हम विश्व को सुखी बनाकर ही अपने सुख का विस्तार कर सकते हैं।

उपर्युक्त उक्ति में कवि ने साधु की परिभाषा या उसके लक्षण को बताया है। केवल एक छोटी सी उपमा देकर या उदाहरण प्रस्तुत करके साधु की परिभाषा कितनी सटीक बताई गई है। यह कवि की सूझबूझ परिचायक है। जैसे सूप से फटक कर या उचिला कर हल्की चीजों या व्यर्थ की चीजों को उड़ा दिया जाता है तथा सार तत्व या मुख्य चीजें उसमें रह जाती हैं, उसी प्रकार साधु का स्वभाव होना चाहिए। इस संसार की आसार वस्तुओं तथा भाव को त्याग कर सार तत्व को ग्रहण करते जाना साधु का कार्य होना चाहिए। ऐसा जिसका स्वभाव है, वही सच्चे अर्थों में साधु कहलाने का अधिकारी है। किंतु सार सार तत्वों की पहचान के लिए विवेक की आवश्यकता होती है। विवेक के द्वारा ही ये अंतर अनुभव किए जा सकते हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने सही ही कहा है- जड़-चेतन, गुण-दोषमय, विश्व किन्ह करतार।

संत-हंस, गुण-पय लयहि, परिहरि वारि विकार।।

13. मनुष्य मात्र बंधु है यही बड़ा विवेक है ।

प्रस्तुत पंक्ति में विश्व बंधुत्व को बहुत बड़ा महत्वपूर्ण विवेक बताया गया है। आज संसार की राजनीतिक परिस्थिति बड़ी विचित्र हो गई है। संपूर्ण विश्व विभिन्न देशों एवं गुटों में विभाजित हो गया है। परिणाम स्वरूप समाज एवं मानवता भी विभाजित या खंडित हो गई है। शक्तिशाली राष्ट्र अपने स्वार्थ के सम्मुख मानवता का विचार अनदेखा कर देते हैं । शक्ति के विकास में घोड़ा घोड़ी लगी हुई है और मानवता की भावना इसमें दफ्ती वाह खंडित विखंडित होती जा रही है यद्यपि संसार में जितने प्राणी हैं सभी हमारी तरह है पता उनके साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसे हम दूसरों से अपनी प्रति चाहते हैं यदि इतना व्यापक भाव नहीं रख सकते हैं तो कम से कम मानव मात्र हमारा बंधु है या भाव

भी रखते हुए इसके निर्वाह का प्रयत्न रखें तो बहुत विवेक या बुद्धिमानी की बात होगी अतः प्रत्येक मानव प्राणी में इसी भाव के विस्तार की अत्यंत अपेक्षा है। किंतु विडंबना यह है कि इस दौर में प्रत्येक मानवतावादी युग में मानव के लिए उनका विवेक दानव बना हुआ है।

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14. करत करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान।

कवि के कहने का तात्पर्य यह है कि लगातार अभ्यास करते रहने से मूर्ख से मूर्ख प्राणी भी ज्ञानी बन जाता है। विद्वान बनने के लिए अधिक बुद्धी या प्रतिभा की जरूरत नहीं है। सामान्य बुद्धि रखने पर भी मनुष्य विद्वान और महा ज्ञानी बन सकता है कुएँ के पत्थर पर बार-बार रस्सी के आने जाने से रेखा बन जाती हैं, रस्सी से पत्थर गिर जाता है। इसी प्रकार परिश्रम से जड़ बुद्धि भी तीव्र हो जाती है। कोई भी छात्र या ना समझे कि वह मंदबुद्धि वाला है। अतः परीक्षा में सफल नहीं हो सकता। मंद से मंदबुद्धि वाला छात्र भी यदि अपना ध्यान पढ़ाई के विषय पर लगा दे, दिन-रात उसी के बारे में सोचता रहे और उसे पाने के लिए तड़पता रहे तो निश्चय ही एक दिन वह सफलतम विद्यार्थी बन जाएगा। परीक्षा में अधिकतम अंक प्राप्त करेगा एक दिन वही विद्वान बनकर समाज में उदित होगा। कहने का तात्पर्य है कि निरंतर अभ्यास से विद्वान बन सकता है और अभ्यास के अभाव में प्रतिभा एवं बुद्धि वाला छात्र शिक्षा से वंचित रह जाएगा। प्रत्येक को पूरी लगन के साथ अभ्यास करना चाहिए। सफलता का सोपान उसके सामने खड़ा जरूर मिलेगा।

15. हम बढ़े उधर कि जिधर राष्ट्र की पुकार हो

राष्ट्र है तभी हम भी हैं, राष्ट्र ठीक ही अपना हित है। हमारा प्रत्येक कार्य राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर ही होना चाहिए। हमारे एक एक प्रयास राष्ट्र के लिए ही होना चाहिए। राष्ट्र का उत्थान और उन्नति हमारे लिए उत्थान और उन्नति को लेकर आएगा । अगर आप अपने राष्ट्र के प्रति इमानदार और कर्म योगी ना होंगे तो राष्ट्र के लिए आप कुछ नहीं कर पाएंगे। इसीलिए कहा गया है -“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।” इसका तात्पर्य है कि माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है। मनुष्य जिस धरती पर जन्म लेता है और जिस देश के रण में पलता है, उसके प्रति भी उसका महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। जिस प्रकार मनुष्य अपने आप का भी जाता है ठीक उसी प्रकार उसके क्रियाकलापों से राष्ट्र की उन्नति और  अवनति निर्भर करती है । अत: हमें याद रखना चाहिए कि राष्ट्र के उत्थान और विकास के लिए अपने कर्म  कार्य से आगे बढ़ते रहना चाहिए।

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