Madhyamik Nibandh

यहाँ आप हिंदी निबंधों के बारे में जान पाएंगे जो माध्यमिक परीक्षा ही नहीं बल्कि बाकि वर्गों की परीक्षाओं में भी पूछा जाता है।

भूमिका:

“काक चेष्टा बको ध्यानं श्वान निद्रा तथैव च ।
अल्पाहारी, गृहत्यागी, विद्यार्थी पंच लक्षणम् ।।”
अर्थात विद्यार्थी को कौवे के समान चेष्टा वाला, बगुले के समान ध्यान वाला, कुत्ते के समान नींदवाला, भूख से कम भोजन करने वाला और सदाचार का पालन करने वाला होना चाहिए । विद्यार्थी इन लक्षणों को धारण करके एक संपूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करता है । विद्यार्थी जीवन की अवधि जानने, सीखने, अनुभव पाने के साथ परिकृष्त व्यक्तित्व गढ़ने की होती है। जो प्रवृतियां और संस्कार इस विद्यार्थी जीवन काल में विकसित हो जाते हैं, वह जीवन पर्यंत बने रहते हैं । अतः एक विद्यार्थी को अपने विद्यार्थी जीवन में सीखें संस्कार को भूलना नहीं चाहिए। उसका सदुपयोग करना सीखना चाहिए।

अनुशासन का अर्थ एवं महत्व:

अनुशासन का अर्थ है – शासन अर्थात व्यवस्था के अनुसार जीवन-यापन करना । विद्यार्थी और अनुशासन का गहरा संबंध है । यद्यपि अनुशासन जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आवश्यक है । किंतु विद्यार्थी जीवन में इसके बिना ज्ञान की प्राप्ति संभव नहीं हो सकती । शिक्षा जीवन विकास का आधार है । यही वह काल है जिसमें विद्यार्थी में चरित्र व्यवहार और आचरण जैसा चाहे वैसा रूप दिया जा सकता है। जो आदतें इस आयु में एक नन्हे, कोमल पौधे के समान होती है, वही वृक्ष बन कर भविष्य में जीवन को परिपक्व बनाती है । यही कारण था कि प्राचीन काल में गुरुकुल में रहकर विद्यार्थी कठोर अनुशासन का पालन करते थे और आज तथा समाज के निर्माण में अपने मजबूत कंधों का सहारा प्रदान करते थे । हमारे भारत के स्वर्णिम अतीत का रहस्य यही था।

छात्रों में बढ़ती अनुशासनहीनता:

सर्वप्रथम माता-पिता घर में शिक्षा व्यवस्था की आधारशिला रखते हैं । इसके अतिरिक्त समाज और आसपास का वातावरण भी बच्चों की आधारशिला को तैयार करने में सहायक होते हैं । लेकिन यही आधारशिला इतनी कमजोर हो, नींव की ईंटें ही मजबूत न हो तो भवन कभी भी मजबूत नहीं बन सकता। विद्यार्थियों के कोमल मस्तिष्क पर बाहरी आकर्षण, चलचित्र, मोबाइल, दूरदर्शन, कंप्यूटर-गेम, जब अपना प्रभाव डालती है तो वह दिग्भ्रमित हो जाते हैं । इस कारण निरंकुशता, अनुशासनहीनता, क्रोध और असहिषुणता की भावना निरंतर बढ़ती जाती है। शिक्षा का उद्देश्य चरित्र संस्कार व नैतिक मूल्यों से भटकता चला जा रहा है।

उपाय:

विद्यार्थियों को अनुशासित करने के लिए अनेक उपाय करने होंगे। इसके लिए शिक्षा पद्धति को रोजगार उन्मुख बनाना होगा । माता-पिता को शिक्षा और संस्कारों के प्रति अधिक से अधिक जागरूक रखना होगा। शिक्षकों तथा शिक्षिकाओं को विद्यार्थियों का जीवन संवारने और उत्कृष्ट बनाने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी। शिक्षण संस्थाओं को भी शिक्षा का व्यवसायीकरण ना करके विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास को ही अपना लक्ष्य बनाना होगा, तभी देश और समाज के निर्माण में सभी का महत्वपूर्ण योगदान होगा।

उपसंहार:

किसी भी देश का किसी भी राष्ट्र का विद्यार्थी नींव की ईंटें के समान होता है। विद्यार्थियों को एक अनुशासनशीलता के साथ जीवन-यापन करना शिक्षण अध्ययन करना बहुत जरूरी होता है । विद्यार्थियों काफी परम कर्तव्य बन जाता है कि वे अपने उत्तरदायित्व को समझें अपने कर्तव्य और दायित्व का अनुशासित होकर पालन करें। विद्यार्जन में ही अधिक से अधिक समय का उपयोग करें जिससे बड़े होकर अपने देश के एक सुशिक्षित चरित्रवान और सभ्य नागरिक बन सकें । इस प्रकार हम लोग देखते हैं कि विद्यार्थी और अनुशासन एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं क्योंकि विद्यार्थी जीवन में अनुशासन ना होने से देश का या राष्ट्र का विकास या उन्नति होना संभव नहीं हो पाएगा क्योंकि एक अनुशासित नागरिक ही देश के लिए उन्नति और उत्थान का ध्यान रखने के लिए दिल और दिमाग से सोचते हुए आगे बढ़ता है।

भूमिका:

प्रकृति ने मानव को भरपूर वैभव दिया है। पेड़ पौधे हरी-भरी वसुंधरा, नदियां, पर्वत, फूल, फल, वनस्पति, प्राणी-जगत, शुद्ध जल, शुद्ध वायु, शुद्ध पर्यावरण आदि। परंतु प्रारंभ से ही मानव की प्रवृत्ति प्रकृति पर विजय पाने की ही रही है । इसी विजय की प्रक्रिया को मानव ने वैज्ञानिक प्रगति और विकास का नाम दे दिया है। यही विकास पर्यावरण को दूषित कर रहा है और एक विकराल समस्या का रूप धारण कर चुका है जिससे स्वयं मानव का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है।

प्रदूषण के प्रकार और हानियां प्रदूषण के मुख्य चार प्रकार हैं जो भूमंडल के पर्यावरण को हानि पहुंचा रहे हैं :-1. वायु प्रदूषण, 2. जल प्रदूषण, 3. ध्वनि प्रदूषण और 4.भूमि प्रदूषण

वायु प्रदूषण:

महानगरों में औद्योगिक क्रांति से वाहनों कारखानों उद्योगों के निरंतर बढ़ने से वायुमंडल में कार्बन मोनोऑक्साइड गैस का परिमाण निरंतर बढ़ रहा है । इस कारण दूषित वायु में सांस लेना दूभर हो रहा है । इससे अस्थमा और दमा आदि बीमारियां बढ़ रही हैं। एयर कंडीशन और रेफ्रिजरेटर से निकलने वाली गैस से पृथ्वी के इर्द-गिर्द की ओजोन परत को हानि पहुंचा रही है जिसके कारण त्वचा संबंधी कैंसर आदि भयानक बीमारियों की संभावना बढ़ रही है। इतना ही नहीं वायु प्रदूषण के कारण पृथ्वी के तापमान में वृद्धि हो रही है। इस कारण मौसम चक्र पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है।

जल प्रदूषण:

जल मानव जीवन की मूलभूत आवश्यकता है । मानव स्वास्थ्य के लिए स्वच्छ जल का होना नितांत आवश्यक है । जल प्रदूषण से तात्पर्य है नदी झीलों तालाबों को गर्व और समुद्र के जल में ऐसे पदार्थों का मिश्रण जो पानी को प्रयोग के योग्य बना दें। जल प्रदूषण का मुख्य कारण कल कारखानों में निकलने वाला रासायनिक कचरा है जो सीधे नदियों और तालाबों में छोड़ दिया जाता है। जिन नदियों और तालाबों का लोग पानी पीते थे, उसी पानी में पशुओं को नहलाया जाता है, कपड़े धोए जाते हैं, मल मूत्र विसर्जित किया जाता है। इस कारण जल प्रदूषित हो रहा है और स्वास्थ्य को हानि पहुंचा रहा है । इसके कारण पीलिया, पेट संबंधी गंभीर बीमारियां उत्पन्न हो रही है।

ध्वनि प्रदूषण :

ध्वनि प्रदूषण मानसिक तनाव उत्पन्न करता है। इससे बहरापन, चिंता और अशांति जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। वैज्ञानिक और औद्योगिक प्रगति के फलस्वरुप कल-कारखानों का वाहनों के हॉर्न का लाउडस्पीकर व संगीत मनुष्य की श्रवण शक्ति को क्षीण कर रहा है । अनिद्रा, सिरदर्द, ह्रदय रोग, रक्तचाप और तनाव का कारण बन रहा है । इसे कम करने के लिए कुछ ठोस और सकारात्मक कदम उठाने चाहिए- जैसे रेडियो टीवी जैसे ध्वनि विस्तारक यंत्रों का कम आवाज में बजाना चाहिए तथा लाउडस्पीकर के आम उपयोग को प्रतिबंधित कर देना चाहिए।

भूमि प्रदूषण:

भूमि को जंगलों से विहीन करना भूमि कटाव ऊंची ऊंची गगनचुंबी इमारतों का रिहायशी और व्यवसायिक प्रयोग करना तथा फसलें उगाते समय अनेक प्रकार की रासायनिक खादों का प्रयोग करना आदि मानव जनित ऐसी क्रियाएं हैं जो निरंतर भूमि प्रदूषण को बढ़ा रही हैं।

उपसंहार:

नि:संदेह आप समय आ गया है कि पर्यावरण संतुलन के लिए ठोस और कड़े कदम उठाने होंगे जिसके लिए शहरीकरण पर रोक लगानी होगी। जनसंख्या वृद्धि पर अंकुश लगाना होगा । वाहनों का प्रयोग को भी कम करना होगा । कल कारखानों से निकलते धो के लिए विशेष प्रबंधन करने होंगे वृक्षों की अंधाधुंध कटाई को रोकना होगा । तभी पर्यावरण प्रदूषण से मुक्त होगा और मानव खुली हवा में सांस ले सकेगा।

कोरोना काल में लॉकडाउन के दौरान नदियाँ , जहां जिनके किनारे कल कारखाने हैं, बंद होने के चलते जमुना नदी स्वच्छ हो गई और प्रदूषण मुक्त भी हो गई। दिल्ली का वातावरण भी काफी स्वच्छ हो गया था लेकिन अनलॉक के बाद में क्या अवस्था में दिल्ली है । यह सभी कोई जानते हैं। अतः कठोर कदम उठाने का समय आ चुका है अगर ऐसा ना किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब हम लोग प्रदूषण के कारण बीमार से ग्रस्त होकर जीवन यापन करेंगे और मरने को विवश हो जाएंगे।

भूमिका:

भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है , राष्ट्र । वास्तव में देखा जाए तो यही धर्मनिरपेक्षता भारत की पहचान है जहां विभिन्न धर्म संप्रदाय अपनी धार्मिक आस्था और विश्वास से अपने धर्म का पालन करते हैं और दूसरे धर्म को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं । यहां पर जितने धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं , उतने संभवत विश्व के किसी अन्य देश में नहीं है।

सांप्रदायिकता का अर्थ:

यद्यपि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है फिर भी भारतीय राजनीति धर्म संप्रदाय से विशेष रूप से प्रभावित रही है। विभिन्न धर्मों के नाम पर अपने राजनीतिक दल बना लेना राष्ट्रीय हितों को ध्यान में ना रख कर राजनीति से अपना स्वार्थ सिद्ध करना, दंगे भड़काने, रक्त मचाना, हिंसा करना आदि में सब राजनीति से प्रेरित होकर ही किया जाता है। अन्यथा हम लोग जानते हैं कि “मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना”। धर्म किसी को बांटता नहीं है, आपस में जोड़ता है । यहां तक कि शिक्षा का क्षेत्र भी अब राजनीति के कारण संप्रदायिकता से अछूते नहीं रह गया है।

सांप्रदायिकता के दुष्परिणाम:

सांप्रदायिकता के कारण आज चारों ओर भेदभाव नफरत और कटुता का जहर फैलता जा रहा है। इसके फलस्वरूप समाज में नैतिकता मानवता सहृदयता और शिष्टता जैसे गुण दिखाई नहीं देते। सद्विचार और अच्छे कर्तव्य तो जैसे निरीह बनकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं। पारस्परिक संबंधों में मन में मनमुटाव आ जाता है। हर जगह दुराचार दिखाई देता है। अनेक देशों का विभाजन भी संप्रदायिकता के जहर से ही हुआ है।

समाधान:

सांप्रदायिकता मानवता के लिए अभिशाप है। आज केवल भारत में नहीं अपितु पूरे विश्व में सांप्रदायिकता का जहर फैल चुका है। संप्रदायिकता देश को आंतरिक शक्ति को ही नहीं, विश्व की शांति को भंग करती है। अतः अपने धर्म संप्रदाय के नाम पर तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति ना करके राष्ट्र हितों को ध्यान में रखना चाहिए। भारत में विविधता है, इसलिए जाति ,धर्म, लिंग, संप्रदाय, भाषा के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए। शिक्षा एवं शिक्षण संस्था में आध्यात्मिक मूल्यों मूल्यों और आदर्शों का समावेश किया जाना चाहिए। सभी धर्मों में सद्भावना आस्था और विश्वास बनाए रखना चाहिए।

उपसंहार:

धर्म के ठेकेदारों और राष्ट्रीय नेताओं का दायित्व बनता है कि वह शौकीन विचारों का त्याग करके अपना दृष्टिकोण व्यापक बनाएं। देश के हितों को वह सर्वोपरि रखें। लोकतांत्रिक आदर्शों तथा मूल्यों की स्थापना करें, तभी सच्चे अर्थों में भारत धर्मनिरपेक्ष राज्य कहलाएगा और हम गर्व से कह सकेंगे-“हिंदी हैं हम! वतन है, हिंदुस्तान हमारा ।”

भूमिका:

आज भारत एक विकासशील देश है और निरंतर प्रगति की ओर अग्रसर हो रहा है। शिक्षा का क्षेत्र हो या चिकित्सा का कंप्यूटर का क्षेत्र हो या अंतरिक्ष की खोज का विश्व भी भारत का लोहा मान चुका है।

परंतु यह क्या?
अंतरिक्ष में उड़ता मानव,
जीवन का या कैसा छोर है?
जितना ही ऊपर जाता है,
उतना ही पतन की ओर है।

भले ही मनुष्य अंतरिक्ष में अपनी विजय पताका लहरा रहा है परंतु आचरण भ्रष्ट होने के कारण उसका नैतिक पतन भी हो रहा है। भारत में तो भ्रष्टाचार ने लोकतंत्र की जड़ों को ही खोखली करनी आरंभ कर दी है।

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  1. माध्यमिक निबंध | Madhyamik nibandh 2021| https://skstudypointsiliguri.com/madhyamik-nibandh/
  2. प्रतिवेदन https://skstudypointsiliguri.com/report-writing-in-hindi/

भ्रष्टाचार के क्षेत्र:

जब मनुष्य विचार से, आचरण से पतित हो जाता है तो वही “भ्रष्टाचार” कहलाता है और यह भ्रष्टाचार समाज और राष्ट्र की उन्नति में बाधक बन जाता है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में चाहे शिक्षा हो या निजी क्षेत्र व्यापार हो या राजनीति मनुष्य भ्रष्टाचार से ही धन उपार्जन में लग जाता है।

मनुष्य की श्रेष्ठता तथा मान सम्मान को आज के युग में केवल धन से आकाश जा रहा है। मानव साम-दाम-दंड-भेद अपनाकर धन कमाने की होड़ में लग गया है। जीवन में सदाचार, ईमानदारी, निस्वार्थ भावना आदि गुणों का कोई मूल्य नहीं रह गया है। सभी विभागों विभागों में उच्च पद आसीन अधिकारी हों या निम्न पद पर सभी भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जाने लगे हैं। देश के प्रति समर्पण सद्भावना से काम करने वाला कोई विरले ही मिलेगा।

भ्रष्टाचार के कारण और प्रभाव:

भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा कारण है- बढ़ती जनसंख्या जो स्वतंत्रता के समय 35 करोड़ थी। आज 130 करोड़ तक पहुंच चुकी है। जनसंख्या की बढ़ते रहने के कारण महंगाई भी बढ़ रही है। सीमित साधन बढ़ती आबादी की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पा रहे हैं। इस कारण रिश्वत जमाखोरी कालाबाजारी भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहा है। दैनिक प्रयोग में आने वाली वस्तुओं में शुद्धता नहीं बची है। दूध, तेल, मसाले यहां तक कि सब्जियों, फल, दवाइयों में भी मिलावट की जाने लगी है जिसका असर स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। अनेक नई नई बीमारियां उत्पन्न हो रही है।

भ्रष्टाचार की समस्या से मुक्ति:

भ्रष्टाचार की समस्या से मुक्ति पाने के लिए सबको निहित स्वार्थ छोड़कर सेवा-भाव से कार्य करने होंगे। सरकार को कोई भाई भतीजावाद छोड़कर सभी के लिए कड़े से कड़े कानून बनाने होंगे जिससे दोषियों को शीघ्र अति शीघ्र दंड मिल सके। समाज सुधारकों सन्मार्ग दर्शकों को सभी कार्य क्षेत्र में पारदर्शिता लाने के लिए लोगों में जागृति लाकर व्यापक आंदोलन करने होंगे। उसके साथ ही परोपकार, सहिष्णुता, ईमानदारी से कार्य करने वाले लोगों को समय-समय पर उत्साहित करने के लिए पुरस्कृत .3करना चाहिए। इससे भी बढ़कर साधारण जनता को भ्रष्टाचारियों का विरोध और बहिष्कार करना होगा। तभी हम इस भ्रष्टाचार की तानों से मुक्ति पा सकेंगे।

उपसंहार:

भ्रष्टाचार आम लोगों के जीवन को नष्ट कर रहा है। एक व्यक्ति को इंदिरा आवास के लिए पैसे देने का पता चला है। 100 दिनों के काम में भ्रष्टाचार है। यहां तक ​​कि यह दैनिक रूप से पढ़ा जाता है कि आपको कई स्थानों पर कटौती के पैसे देने होंगे। इसलिए, भ्रष्टाचार वास्तव में समाज में एक जहर है जो उस नैतिकता को नष्ट कर रहा है। हमें इसे समाप्त करने के लिए आगे आना होगा और इसके खिलाफ शक्ति से काम करना होगा।

मैं भारतवर्ष का सबसे बड़ा और प्रसिद्ध नगर हूं। आज मेरा संबंध संसार के सभी देशों से हैं और यहां विश्व के विभिन्न भागों के लोग दिखाई पड़ते हैं। मेरे यहां प्रायः संसार के सभी भाषा-भाषी और सभी प्रकार के लिबास पहनने वाले लोग देखे जाते हैं। भारतवर्ष का मैं मुख्य आकर्षक केंद्र जहां व्यापार करने विद्या अध्ययन तथा जीविका की समस्या हल करने के लिए देश के हर प्रांत से लाखों की संख्या में लोग आते जाते हैं।

मेरा जो रूप आज है, वह 250 वर्ष पूर्व नहीं था। उस समय यहां घना जंगल था तथा उसमें बाघ, सिंह आदि हिंसक पशु रहते थे। अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी आरंभ में व्यापार करने के लिए जब भारत आई तो व्यापारी दल के नेता जॉब चार्नक ने 1700ई. में मुझे बसाने का दृढ़ संकल्प कर लिया। उस समय गोविंदपुर, सुतानाटी तथा कलीकाता नामक तीन गांव के निकट में हुगली नदी के प्रवाहित होने तथा उसके समुंद्र में मिलने के कारण  विदेशों से जहाज द्वारा व्यापार करने की विशेष सुविधा थी। अतः जंगलों को काट कर शहर बसाने का कार्य आरंभ हुआ। जॉब चार्नक की मृत्यु के बाद भी शहर का बनना जारी रहा। इसका नया नाम कलकत्ता रखा गया। कोलकाता इंप्रूवमेंट ट्रस्ट भी मुझे अधिक सुंदर बनाने की चेष्टा कर रहा है।

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मेरी प्रसिद्धि का सबसे अधिक महत्वपूर्ण कारण यहां का व्यापार है या पूर्वी भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र है। मेरे यहां संसार के सभी देशों से माल मंगाया तथा भेजा जाता है। मेरे आस-पास सैकड़ों दर्शनीय स्थान है जिनमें प्रत्येक का वर्णन यहां संभव नहीं है। धार्मिक दृष्टि से कोलकाता का महत्व काली माता के मंदिर को लेकर हैं जो नगर के दक्षिणी भाग कालीघाट में स्थित है। काली माता के दर्शन के लिए सैकड़ों व्यक्ति आते हैं। अलीपुर की चिड़िया खाना अपने ढंग का अकेला है। यहां संसार के विभिन्न देशों के सैकड़ों जीवित पशु पक्षी तथा सरीसृप जीव पाए जाते हैं। धर्म तले में एक बड़ा मैदान है जो इस प्लेनेट कहलाता है। वहां फुटबॉल के प्रसिद्ध दलों के बीच मैच होता है जो खेल के देशों से विशेष महत्व रखता है। फोर्ट विलियम नामक इस के पास ही स्थित है जिसके निर्माण में 200000 खर्च हुए थे। विक्टोरिया मेमोरियल एक बड़ी इमारत है जिसके भीतर अनेक ऐतिहासिक सामान है। बगल में तारामंडल स्थित है जिसमें बैठे हुए व्यक्ति नक्षत्र और ग्रह की स्थिति मशीन द्वारा दिखाई जाती है । खिदिरपुर के बंदरगाह में संसार के सभी देशों के विशालकाय जहाज देखने को मिलते हैं। हावड़ा का पुल एक अनोखा दृश्य उपस्थित करता है। दूसरा नया ब्रिज किले के बगल में बनाया गया है । इसके बनने से रवींद्र सेतु का भार बहुत हल्का हुआ है।

इतना अधिक महत्वपूर्ण होने पर भी मेरे यहां के जीवन में अनेक दोष आ गए हैं। ट्राम, बस और आदि के कारण बराबर दुर्घटनाएं हुआ करती हैं और बहुत लोग अकाल ही काल-काबलित हो जाते हैं। आबादी बढ़ जाने के कारण निवास की समस्या दूर हो गई है। मकानों में अधिक लोगों के रहने से तरह-तरह की बीमारियां फैलती हैं और प्राय: प्रतिवर्ष हैजा एवं चेचक से बहुत से लोग मर जाते हैं। बाहरी प्रांतों के लोगों का झुकाव कलकत्ते की ओर बढ़ जाने से नौकरी की समस्या जटिल हो गई है। श्रमिकों की संख्या में वृद्धि होने के कारण बहुतों को भूखे रहना पड़ता है।

फिर भी, मैं एक समृद्धशाली नगर हूं और भारत का गौरव है। मुझे स्वास्थ्यकर तथा सुखी बनाने के लिए सरकार ने अनेक योजनाएं बनाई हैं और आशा कि जाती है कि इनके पूर्ण हो जाने पर मेरे यहां का जीवन अधिक सुख में हो सकेगा और मेरे अधिक समृद्ध होने पर भारत का सिर ऊंचा होगा। जमीन के अंदर रेल लाइन बिछाई गई है । यह भूगर्भ रेलवे दमदम से टॉलीगंज तक लोगों को मात्र 23 मिनट में पहुंचा देती है। इसके निर्माण से आवागमन की समस्या सुगम हो गई है।

जिस प्रकार मनुष्य की आंखें आकाश में असंख्य तारों के होते हुए भी ध्रुव तारे को ही खुशी है, उपवन में अनेक प्रकार के पुष्पों के होते हुए भी गुलाब का अपना महत्व है, उसी प्रकार हिंदी साहित्य में हजारों ग्रंथों के होते हुए भी “श्रीरामचरितमानस” सबसे अधिक लोकप्रिय ग्रंथ है । यही वह महान ग्रंथ है जो जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को उचित दिशा प्रदान करता है। आज से लगभग 400 वर्ष पूर्व इस महाकाव्य की रचना हुई तथा आज भी इस महान रचना का महत्व सर्वाधिक है। यह एक विश्व प्रसिद्ध साहित्यिक एवं अध्यात्मिक ग्रंथ हैं। यही एकमात्र हिंदी का ऐसा ग्रंथ है जो हिंदी एवं अहिंदी भाषी सभी का प्रिय एवं सम्मानीय ग्रंथ है। श्रीरामचरितमानस सदियों से एक महान ग्रंथ के रूप में स्वीकृत एवं लोकप्रिय बना हुआ है।

श्री रामचरितमानस में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के पावन चरित्र की झांकी प्रस्तुत की गई है। महाकवि तुलसीदास ने संवत् 1631 ईस्वी में इसे लिखना प्रारंभ किया तथा या महान ग्रंथ संवत 1633 ईस्वी में लिखकर पूरा हुआ। इस ग्रंथ की रचना ‘अवधी’ भाषा में हुई है। इसमें सात कांड हैं- बालकांड, अयोध्याकांड, अरण्यकांड, किष्किंधाकांड, सुंदरकांड, लंकाकांड और उत्तरकांड।

तुलसीदास द्वारा रचित “श्रीरामचरितमानस” एक ऐसा ग्रंथ है जिसके अध्ययन से प्रत्येक व्यक्ति को संतुष्ट सुखी तथा सर्वहितकारी जीवन व्यतीत करने में सहायता मिलती है। श्रीरामचरितमानस सदाचार की शिक्षा देने वाला एक महाकाव्य है। इस ग्रंथ के प्रारंभ में ही कवि ने सदाचार के संबंध में कहा है – वही व्यक्ति वंदनीय है, जो दुख सहकर भी दूसरों के दोषों को प्रगट नहीं करते-

     जे सहि दुख परछित्र दुरावा ।

     वंदनीय जी ही जग जग पावा।।

तुलसीदास जी का दृष्टिकोण व्यापक था। उन्होंने उसी व्यक्ति और वस्तुओं को सर्वश्रेष्ठ माना है जिससे सबका हित होता है, किसी एक का नहीं-

                   कीरती भनिति भूति भलि सोई।

                    सुरसरि सम सब कहं हित होई।।

श्री रामचरितमानस में तुलसीदास ने चीन पात्रों की सृष्टि की है, वह मानव जीवन के आदर्श पात्र हैं। श्री रामचरितमानस में आदर्श भाई, आदर्श पत्नी, आदर्श पुत्र, आदर्श माता, आदर्श पिता, आदर्श सेवक, आदर्श राजा एवं आदर्श प्रजा को प्रस्तुत करके तुलसीदास जी ने उच्च स्तरीय मानव आदर्श की कल्पना की है।

श्री रामचरितमानस में एक ऐसे राज्य की कल्पना की गई है जिसमें कोई किसी से बात नहीं करता। जिसमें सभी प्रेम के साथ रहते हैं और अपने अपने धर्म का पालन करते हैं। जहां सभी उदार हो, कोई भी निर्धन न हो, कोई भी अज्ञानी न हो, किसी को भी दुःख न हो, किसी को रोग न हो। आजादी के बाद गांधी जी ने भी भारत में ऐसे ही रामराज्य की कल्पना की थी।

श्रीरामचरितमानस का स्थान हिंदी साहित्य में ही नहीं जगत के साहित्य में निराला है। इसके जोड़ का ऐसा ही सर्वांगसुंदर उत्तम काव्य के लक्षणों से युक्त भगवान की आदर्श मानव लीला तथा उनके गुण प्रभाव राष्ट्रीय और प्रेम के गण तत्व को अत्यंत सरस रोचक एवं ओजस्वी शब्दों में व्यक्त करने वाला कोई दूसरा ग्रंथ हिंदी भाषा में ही नहीं, कदाचित् संसार की किसी भी भाषा में आज तक लिखा गया है।

उपरोक्त  कारणों से मेरा प्रिय पुस्तक श्रीरामचरितमानस ग्रंथ है ,जो महाकवि तुलसीदास द्वारा रचित ग्रंथ, मेरा प्रिय पुस्तक है।

प्रस्तावना-

भारत की आर्थिक समस्याओं के अंतर्गत महंगाई सबसे प्रमुख समस्या है। वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि इतनी तेजी से हो रही है कि आज जब किसी वस्तु को पुनः खरीदने जाते हैं, तो उस वस्तु का मूल्य पहले से अधिक बढ़ा हुआ होता है।

महंगाई के कारण वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि अर्थात् महंगाई के आने कारण है जिनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार दिया जा सकता है-

i) जनसंख्या में तेजी से वृद्धि -

भारत में जनसंख्या के विस्फोट ने वस्तुओं की कीमतों को बढ़ाने की दृष्टि से बहुत अधिक सहयोग दिया है। जितनी तेजी से जनसंख्या वृद्धि हो रही है उतनी तेजी से वस्तुओं का उत्पादन नहीं हो रहा है जिससे अधिकांश वस्तुओं के मूल्यों में निरंतर वृद्धि हो रही है।

ii) कृषि उत्पादन व्यय में वृद्धि-

भारत कृषि प्रधान देश है यहां की अधिकांश जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। गत् अनेक वर्षों से खेती में काम आने वाले उपकरणों, उर्वरकों आदि के मूल्य में वृद्धि हुई है। फलत: उत्पादित वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि होती जा रही है। अधिकांश वस्तुओं का मूल्य प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पदार्थों के मूल्यों से संबंधित रहता है। इसी कारण जब कृषि मूल्य में वृद्धि होती है तो देश में प्राया सभी वस्तुओं के दाम बढ़ जाते हैं।

iii) कृत्रिम रूप से वस्तुओं की आपूर्ति में कमी-

वस्तुओं का मूल्य मांग और पूर्ति पर आधारित है बाजार में वस्तुओं की कमी होते ही उनके मूल्यों में वृद्धि हो जाती है। अधिक लाभ कमाने के उद्देश्य से भी व्यापारी वस्तुओं का कृत्रिम अभाव पैदा करके महंगाई बढ़ा देते हैं।

महंगाई के कारण होने वाली समस्याएं -

महंगाई  नागरिकों के लिए अभिशाप स्वरूप है। भारत एक गरीब देश है। यहां की अधिकांश जनसंख्या के आय के साधन सीमित है। इस कारण साधारण नागरिक और कमजोर वर्ग के व्यक्ति अपने दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पाते। बेरोजगारी इस कठिनाई को और भी अधिक जटिल बना देती है।

 महंगाई को दूर करने के उपाय-

यदि महंगाई इसी दर से बढ़ती रही तो देश के आर्थिक विकास में बहुत बड़ी बाधा उपस्थित हो जाएगी। इससे अनेक प्रकार का सामाजिक बुराइयां जन्म लेंगे।अतः महंगाई की समस्या को अमूल नष्ट करना अति आवश्यक है। महंगाई को दूर करने के लिए सरकार का समयबद्ध  कार्यक्रम बनाना होगा। किसानों को सस्ते मूल्य पर खाद्य बीज और उपकरण उपलब्ध कराते रहने होंगे ताकि कृषि उत्पादन का मूल्य कम हो सके। मुद्रा प्रसार को रोकने के लिए घाटे को की व्यवस्था खत्म करनी होगी तथा घाटे को पूरा करने के लिए नए नोट छापने की प्रणाली बंद करना होगा। जनसंख्या की वृद्धि को रोकने के लिए निरंतर प्रयास करते रहने होंगे ताकि वस्तुओं का उचित बंटवारा हो सके।

उपसंहार-

महंगाई के कारण हमारी अर्थव्यवस्था में अनेक प्रकार की समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं। घाटे के अर्थव्यवस्था ने इस समस्या को और अधिक बढ़ा दिया है। यद्यपि सरकार की ओर से प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से किए जाने वाले प्रयासों द्वारा महंगाई की इस प्रवृत्ति को रोकने का प्रयास निरंतर किया जा रहा है, फिर भी इस दिशा में अभी तक पर्याप्त सफलता नहीं मिल सकी है। यदि समय रहते महंगाई की समस्या पर नियंत्रण नहीं किया गया तो हमारी अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी और हमारी प्रगति के सारे रास्ते बंद हो जाएंगे। भ्रष्टाचार अपनी जड़े जमा लेंगे और नैतिक मूल्य पूर्णतया समाप्त हो जाएंगे।

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